हराम

शारेअ का ख़िताब अगर किसी फे़अल (काम) को तर्क करने (छोडने) के बारे में हो और ये तलबे जाज़िम के साथ हो, तो ये हराम या महज़ूर कहलाएगा। 

इन दोनों का एक ही मानी है।

हराम वो है जिस के करने वाले की मज़म्मत की जाये और छोड़ने वाले की तारीफ़ की जाये या करने वाला सज़ा का मुस्तहिक़ हो।

शारेअ के ख़िताब में किसी फे़अल को तर्क करने की तलब सेग़ा ऐ नहीं (لا تفعل /नहीं करने) में होगी या जो कुछ इस मानी का क़ाइम मक़ाम (बराबर) हो। फिर अगर इस में कोई ऐसा क़रीना पाया जाये जो फे़अल के तर्क (छोडने) को तलबे जाज़िम होने का फ़ायदा दे, तो इस के बाइस (सबब) ये फे़अल हराम क़रार पायगा।

मिसाल :

وَلَا تَقۡرَبُواْ ٱلزِّنَىٰٓۖ إِنَّهُ ۥ كَانَ فَـٰحِشَةً۬ وَسَآءَ سَبِيلاً۬
“ख़बरदार ज़िना के क़रीब भी ना फटकना क्यों कि वो बड़ी बेहयाई है और बहुत ही बुरी राह है” (अल इसरा-32)

यहां सेग़ाए नहीं (لا تقربوا) से तलबे तर्क (छोडने की मांग) साबित है , जबकि (إنہ کان فاحشہ وساء سبیلا) इस के तलबे जाज़िम होने का क़रीना (इशारा) है। यूं ज़िना का हराम होना साबित हुआ।

मकरूह:

शारेअ (शरीअत अता करने वाला/ अल्लाह سبحانه وتعالى) का ख़िताब अगर किसी फे़अल (काम) को तर्क करने (छोडने) के बारे में हो मगर तलब जाज़िम के साथ ना हो, तो ये मकरूह कहलाएगा। मकरूह वो है जिस के छोड़ने वाले की तारीफ़ की जाये और करने वाले की मज़म्मत ना की जाये, या जिस का छोड़ना करने से बेहतर हो।

शारेअ के ख़िताब में किसी फे़अल को तर्क करने की तलब (मांग) पाई जाये, फिर इस में कोई ऐसा क़रीना (इशारा) पाया जाये जो उस को तलबे ग़ैर- जाज़िम (बिना निश्चित मांग का) होने का फ़ायदा दे, तो इस के बाइस ये फ़ेअले मकरुह क़रार पायगा।

मिसाल :
)من کان موسرا ولم ینکح فلیس منا (البیھقي(
(वो जो मालदार हो और निकाह ना करे तो वो हम में से नहीं)

यहां सेग़ाऐ नहीं (मनाही) के मानी में रसूलुल्लाह صلى الله عليه وسلم ने निकाह नहीं करने से मना किया है, अलबत्ता आप صلى الله عليه وسلم ने बाअज़ मालदारों के निकाह ना करने पर सुकूत (खामोशी) इख़्तियार कि, जो इस तलब (मांग) के ग़ैर-जाज़िम (अनिश्चत) होने का क़रीना है। लिहाज़ा मालदारों के लिए अदम निकाह मकरूह क़रार पाया।


Share on Google Plus

About Khilafat.Hindi

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments :

इस्लामी सियासत

इस्लामी सियासत
इस्लामी एक मब्दा (ideology) है जिस से एक निज़ाम फूटता है. सियासत इस्लाम का नागुज़ीर हिस्सा है.

मदनी रियासत और सीरते पाक

मदनी रियासत और सीरते पाक
अल्लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم) की मदीने की जानिब हिजरत का मक़सद पहली इस्लामी रियासत का क़याम था जिसके तहत इस्लाम का जामे और हमागीर निफाज़ मुमकिन हो सका.

इस्लामी जीवन व्यवस्था की कामयाबी का इतिहास

इस्लामी जीवन व्यवस्था की कामयाबी का इतिहास
इस्लाम एक मुकम्म जीवन व्यवस्था है जो ज़िंदगी के सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने अंदर समाये हुए है. इस्लामी रियासत का 1350 साल का इतिहास इस बात का साक्षी है. इस्लामी रियासत की गैर-मौजूदगी मे भी मुसलमान अपना सब कुछ क़ुर्बान करके भी इस्लामी तहज़ीब के मामले मे समझौता नही करना चाहते. यह इस्लामी जीवन व्यवस्था की कामयाबी की खुली हुई निशानी है.